पचास वर्षो के बाद जीवन जीने की कला

उम्र के साथ समझौता कर लो 50 साल की उम्र ऐसी होती है , जहा पर या तो जिम्मेदारी ख़तम हो जाती है या बढ़  जाती है , जो व्यक्ति जल्दी शादी कर लेता है और जिसके बच्चे जल्दी हो जाते है ५० से ६० साल को उम्र तक उसे यह सब निभाना ही पड़ता है !

          एक माँ बाप उनके चार बच्चो को पड़ा लिखा कर शादी करा कर उनकी जिंदगी को एक दिशा देते है ,जिसे वह अपनी जिम्मेदारी समज़ते है,और यह जिम्मेदारी को निभाने में अपने खून पसीना एक कर उनकी पढ़ाई लिखाई में पैसा कमाकर लगा देते है , वे अपने बच्चो पर इतना विश्वास करते है कि वह अपने बुढ़ापे मे मेरा साथ नहीं देंगे तो हमारा क्या होगा ? इस तरह का सोचना उनके लिये पाप सामान है !

          बच्चो को डॉक्टर,इन्जिनियर  बनाने के लिए वे अपना सावस्थय दाव पर लगा देते है,लेकिन यही बच्चे जब उनका तिरस्कार करते है बहुये अपमानित करती है समय से देख रेख नहीं होती, खाना पीना नहीं मिलता, जिन माँ बाप ने पूरी जिंदगी संभाला अभी वो ही माँ बाप बच्चो को भोझ लगने लगते है ,फिर यही बच्चे अपनी पत्नी और अपने बच्चो में अपना भविष्य खोजने लगते है,और अपने माँ बाप उनके लिए एक बड़ी समस्या बन जाते है ! अब यह भी वही कार्य कर रहे है जो इनके माँ बाप ने किया अपनी पूरी जिंदगी की जमा पूँजी दाव पर लगा कर अपने बच्चो के भविष्य उज्वल हेतु अपना सब दाव पर लगा दिया,और वे ही बच्चे अपने बच्चो के भविष्य के लिए अपने माँ बाप तक को वृद्धा आश्रम  में भेज देते है !

                    यह कड़ी निरंतर चलने वाली है,वर्तमान में इसे आप साक्ष्य के रूप में ले  सकते है, वृद्धा  आश्रम में वही माँ बाप जाते है,जिनके बच्चे डॉक्टर ,इन्जीनियर, मेनेजर ऐसी बड़ी बड़ी पोस्ट पर काम करके अच्छा पैसा कमाते है !

           लाइंस क्लब और रोटरी के अघ्यश्च के नाते जितने भी व्रद्धा आश्रामों का मैंने अवरोकन किया उसमे कही भी करीब लोगो के माँ बाप को नहीं देखा, धनवान बच्चो के माँ बाप अब सोचते है,की मैंने भी उनकी पढ़ाई लिखाई में अपने पुरे जीवन की पूँजी भी नष्ट कर दी इसीलिए आज मेरे पास न पैसा है और न बेटा है, हमसे तो वो अनपढ़ लोग बहुत समाजदार थे जिन्होंने बच्चो को शिक्षा तो दिलाई लेकिन केवल जीवन यापन के लिए,

               यही कारण है की उनंके पास उनका पूरा परिवार है,उनका पूरा परिवार उनके साथ है, अगर यही हाल रहा तो लोग अपने बच्चो को उच्च शिक्षा दिलाने से पहले कई बार सोचेंगे,आगे आने वाले समय में जो बच्चे अपने माँ बाप के वृद्धा आश्राम भेजकर अपने जिम्मेदारी की पूर्ति समझ रहे है,वो सब भी बुढ़े हो चुके होंगे और उन्हें भी वृद्धा आश्रम का सहारा लेना पड़ेगा, तब उन्हें महसूस होगा की हमने अपने माँ बाप को वृद्धा आश्रम में डालकर बहुत बड़ी गलती कि और उनमे से शायद कुछ लोग अपने पाप  के प्रायश्चित हेतु वृद्धा आश्रमों  चरक्कर लगा रहे हो,लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी, उन निर्दोष  माँ बाप को अपने असीम बलिदान की सजा पाकर अंतिम यात्रा पर निकल चुके होंगें और वही नालायक लड़के जिंदगी भर प्रायश्चित की आग में जलकर खून के आसू रोते  रहें !!

महेश प्रभु ओझा

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